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300 से ज़्यादा जवानों की शहादत का जिम्मेदार कुख्यात नक्सली हिडमा ढेर; सुरक्षाबलों ने उसके आतंक का अंत कर दिया।

तुलसीकृत रामचरितमानस में एक प्रसंग है और प्रसंग तब का है, जब बड़े भाई राम के कहने पर लक्ष्मण रावण की बहन शूर्पणखा की नाक काट लेते हैं. कटी हुए नाक के साथ शूर्पणखा अपने भाई रावण के पास जाती है और पूरा हाल सुनाती है. तब रावण उसे खर-दूषण के पास जाने को कहता है लेकिन शूर्पणखा बताती है कि खर-दूषण तो मारे गए. उस वक्त रावण की मनोदशा का जिक्र करते हुए तुलसीदास लिखते हैं – सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहँ कोउ नाहीं॥ खर दूषन मोहि सम बलवंता। तिन्हहि को मारइ बिनु भगवंता॥1॥

यानी कि मेरे सेवकों से भी कोई देवता, इंसान, राक्षस या पक्षी टकराने की हिम्मत नहीं रखता. खर और दूषण मेरे बराबर के योद्धा थे और उन्हें भगवान के बिना कोई मार नहीं सकता है. ये खर और दूषण जिस जगह पर मारे गए और जहां सूर्पणखा की नाक काटी गई, सतयुग में उसे कहा जाता था दंडक वन, जो रावण के ही साम्राज्य का एक हिस्सा था और जिसपर खर-दूषण का राज था. जब राम उस दंडक वन में गए तो उन्होंने राक्षसों का संहार किया और इसी उपक्रम में पंचवटी से सीता हरण भी हुआ, जो दंडक वन का ही हिस्सा था.

इस दंडक वन की पुरानी कहानी इसलिए, क्योंकि कलियुग में और आधुनिक भारत में उस दंडक वन को दंडकारण्य कहा जाता है. करीब 92 हजार वर्गकिलोमीटर का इलाका, जिसपर कुछ वक्त पहले तक वो लाल आतंक तारी था, जिसे नक्सलवाद कहा जाता है और जिसके खूंखार लोग हथियारों के बल पर इस देश की सत्ता को हासिल करने का ख्वाब देखते रहे हैं, लेकिन अब इस आतंक के ताबूत में आखिरी कील की तरह ठुक गई है. सुरक्षाबलों ने उस एक करोड़ के इनामी नक्सली हिडमा को मार गिराया है, जिसके माथे पर 200 से भी ज्यादा सुरक्षाबलों की हत्या का दाग था और जिसे दंडकारण्य के जंगलों में एक मिथक के तौर पर देखा जाता था. आइए आपको नक्सली आतंक के उस आका के खात्मे की कहानी बताते हैं, जिसने अपनी पत्नी के साथ मिलकर पूरे दंडकारण्य को लाल आतंक के साये में जीने को मजबूर कर दिया था.

हिडमा के नाम से कुख्यात था नक्सली

उस नक्सली को संतोष, हिडमालू, हिडमन्ना या माडवी हिडमा के नामों से भी जाना जाता था, लेकिन सुरक्षाबलों के दस्तावेज में वो हिडमा के नाम से कुख्यात था, जिसने दंडकारण्य इलाके में कम से कम 26 नक्सली ऑपरेशन को अंजाम दिया था और जिसमें करीब 200 से ज्यादा सुरक्षाबलों के जवान शहीद हुए थे. अपने खतरनाक ऑपरेशन की वजह से वो अपने लोगों के बीच एक जीवंत किंवदंती बन गया था, जिसे देख कोई नहीं सकता था, लेकिन उसकी दहशत सबको महसूस होती थी.

2007 में हिडमा ने बस्तर के सुरक्षा कैंप पर किया था हमला

इस हिडमा का शुरुआती सबसे बड़ा हमला था साल 2007 में बस्तर के सुरक्षा कैंप पर हुआ हमला. रानी बोदली के सुरक्षा कैंप पर हुए इस हमले में 55 जवान शहीद हुए थे. साल 2010 में दंतेवाडा के जिस नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे, उसका मास्टरमाइंड भी यही हिडमा था. इस हमले को अंजाम देने वाला एक और बड़ा नक्सली बसवाराजू भी इसी साल मई में मारा जा चुका है.

वहीं, 2010 में ही चिंगावरम के आईडी ब्लास्ट में 20 जवान शहीद हुए थे. उसे भी इसी हिडमा ने अंजाम दिया था. 2013 में झीरम घाटी में हुए नक्सली हमले में छत्तीसगढ़ के टॉप कांग्रेस नेता समेत कुल 32 लोग मारे गए थे, उसके पीछे भी यही हिडमा था, जिसके नेतृत्व में 250 से ज्यादा नक्सलियों ने करीब डेढ़ घंटे तक फायरिंग की थी. 2017 के बुरकापाल नक्सली हमले का भी जिक्र हो, जिसमें सीआरपीएफ के 25 जवान मारे गए थे या फिर 2021 के सुकमा-बीजापुर एनकाउंटर की बात, जिसमें 22 जवान शहीद हुए थे, इन सारे हमलों का जिम्मेदार यही हिडमा था, जिसने महज 15 साल की उम्र में ही हथियार उठा लिए थे और 50 की उम्र पार करते-करते वो देश के करीब 26 बड़े नक्सली हमलों का जिम्मेदार हो गया था, जिसके हमले में कम से कम 200 जवानों की शहादत हुई थी.

1981 में कुख्यात नक्सली हिडमा का हुआ था जन्म

कहानी शुरू होती है छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के पुरवत्ती गांव से, जहां साल 1981 में संतोष पैदा हुआ था. मुरिया जनजाति में पैदा हुए संतोष का गांव पुरवत्ती सुकमा और बीजापुर जिले के बॉर्डर पर पड़ता है. वो महज 10 साल की उम्र में भी नक्सलियों के समूह में भर्ती हो गया था, जिसे तब बाल संघम कैडर कहते थे. 15 साल का होते-होते उसने हथियार उठा लिए थे, जिसकी ट्रेनिंग उसे तब दो बड़े नक्सली रमन्ना और बदरन्ना ने दी थी. एक-एक पायदान चढ़ते हुए वो पहुंच गया नक्सलियों के उस हथियारबंद दस्ते में, जिसे PLGA कहा जाता है यानी पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी.

वो साल 2000 था और तारीख थी 2 दिसंबर. नक्सलियों की ओर से प्रेस रीलीज जारी करके बताया गया कि वो एक नया और हथियारबंद संगठन बना रहे हैं, जिसका नाम पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी होगा. ये गुरिल्ला आर्मी तुर्की, फिलिपींस और पेरू के संगठनों की तर्ज पर काम करेगी.

नक्सलियों की सबसे टॉप मोस्ट संस्था सेंट्रल मिलिट्री कमीशन के नेतृत्व में पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी काम करेगी और जहां-जहां भी नक्सलियों के खिलाफ सुरक्षाबल ऑपरेशन चलाएंगे, पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी उनका मुंहतोड़ जवाब देगी. हथियारबंद संतोष यानी कि हिडमा भी इसी पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी का एक लड़ाका बन गया. वो जंगल में लड़ने में माहिर था, घात लगाकर हमला करने में माहिर था और अपने लड़ाकों के साथ सुरक्षाबलों से मुठभेड़ करके भाग जाने में माहिर था. जंगली इलाके में उसका कम्युनिकेशन नेटवर्क और उसा इंटेलिजेंस बहुत मजबूत था. उसने ये सारी खूबियां मध्यप्रदेश के बालाघाट में अपनी ट्रेनिंग के दौरान हासिल की थीं और साल 2002 में वो छत्तीसगढ़ में पूरी तरह से सक्रिय हो गया.

15 मार्च, 2007 को हुआ था भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा नक्सली हमला

साल 2004 आते-आते वो बस्तर की कोंटा एरिया कमेटी का सेक्रेटरी बन गया. 2007 में वो पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की कंपनी नंबर 3 का कमांडर बन गया, जिसके बाद उसने भारत के इतिहास के सबसे बड़े नक्सली हमले को अंजाम दिया. वो तारीख थी 15 मार्च, 2007. 16 मार्च को देश में होली का त्योहार था और पूरा देश इस त्योहार की तैयारियां करके थक के नींद के आगोश में था. छत्तीसगढ़ के शहर बीजापुर से करीब 50 किलोमीटर दूर रानीबोदली कैंप में सेना के भी 56 जवान नींद में थे. 15 मार्च की रात इसी हिडमा के नेतृत्व में करीब 500 नक्सलियों ने पूरे गांव को घेर लिया और जवानों पर ताबड़तोड़ फायरिंग कर दी. जब तक जवान हथियार संभालते और नक्सलियों के खिलाफ मोर्चा संभालते, उन्होंने जवानों को कमरे में बंद करके पेट्रोल बम फेंक दिए. दो घंटे के इस खूनी खेल में 55 जवान शहीद हुए थे और तब ये भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा नक्सली हमला था.

नक्सली हमले के बाद हिडमा को संगठन में मिला था प्रमोशन

इस नरसंहार ने हिडमा को उसके संगठन में एक अलग पहचान दिला दी. इनाम के तौर पर उसे साल 2009 में पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी के सबसे खतरनाक दस्ते PLGA बटालियन नंबर 1 का डिप्टी कमांडर बना दिया गया. साल 2010 में वो पीएलजीए बटालियन नंबर 1 का सुप्रीम कमांडर बन गया और तब उसने ताड़मेटला का वो नक्सली हमला करवाया, जिसे भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा नक्सली हमला माना जाता है. इस हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हुए थे. अपने नक्सली संगठन में हिडमा जैसे-जैसे एक-एक सीढ़ी चढ़ता गया, वो खुद को और भी रहस्यमयी बनाता गया. उसने अपनी एक फोटो जारी होने दी, जिसमें वो एक एके-47 के साथ नजर आता है. उसकी यही एक फोटो सुरक्षाबलों के पास भी मौजूद थी. उसके इस ऑपरेशन में उसके साये की तरह साथ रही उसकी पत्नी राजे या राजक्का, जो हिडमा की तरह ही खतरनाक थी और सुरक्षाबलों के लिए एक गंभीर चुनौती थी.

दो घंटे के ऑपरेशन में सुरक्षाबलों ने किया हिडमा का खात्मा

इन दोनों पति-पत्नी ने मिलकर दंडकारण्य में वो दहशत मचाई कि सुरक्षाबलों का बड़े से बड़ा ऑपरेशन, सबसे आधुनिक तकनीक और सारे आधुनिक हथियार भी इनकी एक फोटो तक नहीं खींच पाए, उनके पास पहुंचना तो बहुत दूर की बात थी. हथियारों के नाम पर इनके पास एके 47 और एके 56 के अलावा एसएलआर, इन्सास, कॉर्बाइन, रॉकेट और IED जैसे हथियार थे, जिनके जरिए ये किसी भी आर्मी से मुठभेड़ कर लेते थे. जिन नक्सलियों ने हाल के दिनों में सरेंडर किया है और जिनका सीधा वास्ता कभी न कभी हिडमा से रहा है, वो भी बताते हैं कि हिडमा अपनी हथेली पर जंगल का नक्शा बना लेता था और भागने के रास्ते तलाश कर लेता था. सुरक्षाबलों से कई बार घिरने के बाद भी वो कभी घबराता नहीं था और किसी भी वारदात को अंजाम देने से पहले फूलप्रुफ प्लानिंग करता था, लेकिन मंगलवार (18 नवंबर, 2025) की सुबह इस कुख्यात नक्सली के लिए काल साबित हुई. जो नक्सली पिछले 35 साल से भी ज्यादा वक्त से भारत के सुरक्षाबलों के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ था, उसे महज दो घंटे में ही सुरक्षाबलों ने मार गिराया.

तय तारीख से पहले सुरक्षाबलों ने हिडमा का किया खात्मा

दरअसल, मंगलवार (18 नवंबर, 2025) की सुबह हिडमा अपनी पत्नी मडक्कम राजे के साथ छत्तीसगढ़ से भागकर आंध्रप्रदेश के अल्लुरी सीताराम राजू जिले के मारेडूमिली जंगल में छिपा हुआ था. पिछले कुछ हफ्तों से सुरक्षाबलों ने उसकी मूवमेंट पर नजर रखी थी, क्योंकि गृहमंत्री अमित शाह ने हिडमा के मारे जाने की डेडलाइन तय कर रखी थी और वो तारीख 30 नवंबर, 2025 तय हुई थी. इसी के तहत हिडमा की तलाश चल रही थी. 17 नवंबर की रात को ही सुरक्षाबलों को आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़-ओडिशा बॉर्डर पर बड़ी संख्या में नक्सल मूवमेंट की खबर मिली थी. कॉम्बिंग चल रही थी और तभी 18 नवंबर की सुबह करीब 6 से 7 बजे के बीच मारेडूमिली के जंगल में सुरक्षाबलों के साथ हिडमा के ग्रुप की मुठभेड़ हो गई. इसमें हिडमा, उसकी पत्नी और चार और भी नक्सली मारे गए और इस तरह से सुरक्षाबलों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की तय की गई समयसीमा से 12 दिन पहले ही हिडमा को मार गिराया.

हालांकि, हिडमा जिस तरह से महज दो घंटे के ऑपरेशन में मारा गया है, वो सुरक्षाबलों के लिए बहुत राहत की खबर है. क्योंकि इससे पहले भी कम से कम पांच बार बड़ी कोशिश हुई, हिडमा को घेरने की, उसे मारने की, लेकिन हमेशा सुरक्षाबल के जवान ही ट्रैप में फंसते रहे और अपनी जान गंवाते रहे. उदाहरण के तौर पर ऑपरेशन प्रहार, जो साल 2017 में हुआ था. इसका मकसद ही हिडमा को जिंदा या मुर्दा पकड़ना था. महीनों कॉम्बिंग हुई, हजारों सुरक्षाकर्मियों ने दिन-रात एक किया, कहा गया कि हिडमा को गोली भी लगी थी, लेकिन उसका कुछ नहीं बिगड़ा और वो पहले से भी ज्यादा ताकतवर और खूंखार होकर सामने आया.

2021 में एक और कोशिश हुई. सीआरपीएफ, कोबरा, डीआरजी और एसटीएफ के 800 से भी ज्यादा जवानों ने मोर्चा संभाला, लेकिन वो हिडमा के बिछाए जाल में फंस गए और 22 जवानों की शहादत हो गई. अभी इसी साल अप्रैल में ही भारतीय इतिहास का सबसे बड़ा एंटी नक्सल अभियान चलाया गया, जिसमें करीब 25 हजार जवान लगाए गए. मकसद हिडमा का ही खात्मा था. 31 दूसरे नक्सली मारे गए, लेकिन हिडमा उसमें भी बच गया.

31 मार्च, 2026 देश में नक्सलवाद की होगी आखिरी तारीख

इस ऑपरेशन में शामिल अधिकारियों का कहना था कि उन्हें पता चल भी जाता था कि हिडमा कहां है तो उस तक पहुंचने से पहले ही उसे पता चल जाता था और वो वहां से निकल जाता था, लेकिन 18 नवंबर को जो हुआ, वो तो सुरक्षाबलों ने कभी सोचा भी नहीं था. जो हिडमा इतने बड़े-बड़े ऑपरेशन के बीच से सुरक्षित भागने में कामयाब रहा था, वही हिडमा महज दो घंटे की मशक्कत में ही मारा गया. और अब दंडकारण्य के आम लोगों में जश्न का माहौल है. क्योंकि हिडमा की मौत सिर्फ एक नक्सली की मौत नहीं बल्कि उस पूरे आंदोलन की मौत है, जिसने इलाके में लाल आतंक कायम कर रखा था. अब हिडमा के आगे-पीछे के जो लोग हैं वो या तो बीमार हैं, बूढ़े हैं या फिर इतने कमजोर हैं कि उनकी कोई नहीं सुनने वाला. पहले बसवराजू और हम हिडमा की मौत ने उस लक्ष्य को हासिल करने की दिशा में अंतिम मुहर लगा दी है, जिसके तहत 31 मार्च, 2026 इस देश में नक्सलवाद की आखिरी तारीख होगी.

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