Breaking News

सीमा पार तनाव के बीच सवाल: बार-बार पश्तून क्षेत्रों में ही क्यों होती हैं सैन्य कार्रवाइयाँ?

पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा से लगे इलाकों में हाल के दिनों में हुई सैन्य कार्रवाइयों ने एक बार फिर पश्तून समुदाय की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। बीते 24 घंटों में सीमा पार और खैबर पख्तूनख्वाह में हुई घटनाओं में कई नागरिकों की मौत की खबरें सामने आई हैं।

सीमा पार कार्रवाई और नागरिक हताहत

अफगानिस्तान के नंगरहार प्रांत के बेसुद इलाके में कथित हवाई हमले में एक रिहायशी मकान को निशाना बनाए जाने की सूचना है। स्थानीय सूत्रों के मुताबिक इस हमले में बच्चों समेत कई नागरिकों की मौत हुई। इसी तरह पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत के ओरकज़ाई जिले की तिराह घाटी में भी एक वाहन पर गोला दागे जाने की घटना सामने आई, जिसमें नागरिक हताहत हुए।

इन घटनाओं के बाद स्थानीय लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान झड़प और गोलीबारी की भी खबरें हैं, जिसमें कई लोग घायल हुए। हालांकि इन घटनाओं के संबंध में आधिकारिक आंकड़ों और दावों की स्वतंत्र पुष्टि चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।


आतंकवाद विरोधी अभियान और आरोप

पाकिस्तानी सेना का कहना है कि वह सीमावर्ती इलाकों में आतंकवाद के खिलाफ अभियान चला रही है, खासकर उन समूहों के खिलाफ जो सीमा पार से हमले करते हैं। इनमें प्रमुख रूप से Tehrik-i-Taliban Pakistan (TTP) का नाम लिया जाता है, जो खैबर पख्तूनख्वाह में सक्रिय रहा है।

आलोचकों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का आरोप है कि इन अभियानों में आम पश्तून आबादी भी प्रभावित हो रही है। उनका कहना है कि आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर नागरिक इलाकों में भी सैन्य बल प्रयोग किया जा रहा है, जिससे महिलाओं और बच्चों सहित आम लोगों की जान जा रही है।


पश्तून आबादी और डूरंड लाइन विवाद

दुनिया की अधिकांश पश्तून आबादी पाकिस्तान और अफगानिस्तान में रहती है। ये लोग पश्तो भाषा बोलते हैं और ऐतिहासिक रूप से दोनों देशों की सीमा के आर-पार बसे हुए हैं।

पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा, जिसे Durand Line कहा जाता है, लंबे समय से विवाद का विषय रही है। अफगानिस्तान के कई पश्तून इस सीमा को औपनिवेशिक विरासत मानते हुए पूरी तरह स्वीकार नहीं करते। यही कारण है कि सीमा पार आवाजाही, पहचान और वफादारी को लेकर अक्सर तनाव बना रहता है।


ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक संदर्भ

पश्तूनों के प्रमुख नेता Khan Abdul Ghaffar Khan, जिन्हें “फ्रंटियर गांधी” कहा जाता है, ने भारत के विभाजन का विरोध किया था और पश्तूनों के अधिकारों की वकालत की थी। विभाजन के बाद पाकिस्तान की सत्ता संरचना में पंजाब-केन्द्रित नेतृत्व के प्रभाव और पश्तून क्षेत्रों में असंतोष की चर्चा लंबे समय से होती रही है।

1980 के दशक में अफगान-सोवियत युद्ध के दौरान सीमावर्ती पश्तून इलाकों का उपयोग मुजाहिदीन गतिविधियों के लिए किया गया। बाद के दशकों में भी यह क्षेत्र आतंकवाद, उग्रवाद और सैन्य अभियानों का केंद्र बना रहा।

15 अगस्त 2021 को अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने के बाद भी सीमा पार तनाव पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच सुरक्षा मुद्दों पर अविश्वास बना हुआ है।


जटिल वास्तविकता

स्थिति अत्यंत जटिल है। एक ओर पाकिस्तान आतंकवाद विरोधी कार्रवाई की बात करता है, वहीं दूसरी ओर स्थानीय समुदायों और मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि इन अभियानों में आम पश्तून नागरिकों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि स्थायी समाधान केवल सैन्य कार्रवाई से नहीं, बल्कि राजनीतिक संवाद, आर्थिक विकास, शिक्षा और स्थानीय समुदायों के विश्वास बहाली से ही संभव है।

कुल मिलाकर, पश्तून बहुल क्षेत्रों में जारी घटनाक्रम दक्षिण एशिया की सुरक्षा, सीमा विवाद और जातीय पहचान की राजनीति से गहराई से जुड़ा हुआ है, जिसका समाधान संतुलित और संवाद-आधारित दृष्टिकोण से ही निकाला जा सकता है।

About SFT-ADMIN

Check Also

क्या Iran के टॉप कमांडर बन सकते हैं निशाना? संभावित स्ट्राइक की खबरों से United States–ईरान संबंधों में बढ़ा तनाव

मिडिल ईस्ट में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिख रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, United States ने Iran के …

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *