होली का त्योहार पूरे भारत में अलग-अलग अंदाज में मनाया जाता है, लेकिन Barsana की लट्ठमार होली दुनिया भर में अपनी अनोखी परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यह केवल रंगों का उत्सव नहीं बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक है। Mathura और Vrindavan में होली का उत्सव विशेष रूप से धूमधाम से मनाया जाता है और यहां त्योहार की शुरुआत धुलेंडी से लगभग एक सप्ताह पहले ही हो जाती है।
होली के इस खास उत्सव में पहले दिन लड्डूमार होली खेली जाती है, जबकि दूसरे दिन लट्ठमार होली का आयोजन होता है। हर साल हजारों श्रद्धालु और पर्यटक इस अनोखे उत्सव को देखने के लिए बरसाना पहुंचते हैं।
कैसे शुरू हुई लट्ठमार होली
मान्यताओं के अनुसार Radha का जन्म स्थान बरसाना है। कथा के मुताबिक Krishna अपने ग्वाल मित्रों के साथ Gokul से बरसाना आते थे और राधा रानी व उनकी सखियों पर शरारत करते हुए रंग डालते थे।
कहा जाता है कि जब श्रीकृष्ण और उनके मित्रों ने बार-बार रंग डालकर राधा और उनकी सखियों को छेड़ा, तो वे नाराज हो गईं। इसके बाद सखियों ने लाठियों से ग्वालों को खदेड़ना शुरू कर दिया। कृष्ण और उनके साथी इस मजेदार “मार” से बचने के लिए इधर-उधर भागते और छिपते थे। इसी प्रसंग की याद में आज भी बरसाना में लट्ठमार होली खेली जाती है।
दुनियाभर में मशहूर है यह उत्सव
बरसाना की प्रसिद्ध रंगीली गली में यह परंपरा निभाई जाती है, जिसे राधा-कृष्ण की लीला से जुड़ा पवित्र स्थल माना जाता है। यहां देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं और इस अनोखी होली का आनंद लेते हैं।
लट्ठमार होली से एक दिन पहले बरसाना के प्रसिद्ध Shri Ji Temple में लड्डूमार होली खेली जाती है, जहां भक्तों पर लड्डू बरसाए जाते हैं।
केवल रंगों का त्योहार नहीं
मथुरा-वृंदावन की होली सिर्फ अबीर-गुलाल तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह एक बड़े उत्सव के रूप में मनाई जाती है। यहां लट्ठमार होली के दौरान पारंपरिक तरीके से लाठी चलाने की प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं, जो इस आयोजन को और भी रोचक बना देती हैं।
इसी वजह से बरसाना की लट्ठमार होली भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में सांस्कृतिक विरासत और परंपरा का अनोखा उदाहरण मानी जाती है।
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