अमेरिका में H-1B वीजा से जुड़ी एक महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाई में संघीय अदालत ने प्रशासन की उस योजना को खारिज कर दिया है, जिसके तहत वीजा आवेदन शुल्क में भारी बढ़ोतरी प्रस्तावित की गई थी। अदालत के फैसले के बाद हजारों विदेशी पेशेवरों और उन्हें नियुक्त करने वाली कंपनियों को बड़ी राहत मिली है।
मामला तब शुरू हुआ जब कई राज्यों ने नई वीजा शुल्क नीति को चुनौती देते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि प्रस्तावित शुल्क वृद्धि न केवल अत्यधिक है, बल्कि इसे लागू करने के लिए आवश्यक वैधानिक अधिकार भी स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं हैं।
सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि प्रस्तावित शुल्क सामान्य प्रशासनिक शुल्क की बजाय कर (टैक्स) की प्रकृति का प्रतीत होता है। न्यायालय का मत था कि इस प्रकार का आर्थिक भार लगाने के लिए विधायी स्वीकृति आवश्यक होती है और केवल प्रशासनिक निर्णय के आधार पर इसे लागू नहीं किया जा सकता।
अदालत ने यह भी माना कि इस तरह की नीति का असर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, तकनीक और अनुसंधान जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर पड़ सकता है, जो बड़ी संख्या में विदेशी विशेषज्ञों पर निर्भर रहते हैं। न्यायाधीश ने कहा कि संबंधित एजेंसियां ऐसी व्यवस्था लागू नहीं कर सकतीं, जिसके लिए स्पष्ट कानूनी अधिकार उपलब्ध न हों।
हालांकि प्रशासन ने संकेत दिया है कि वह इस फैसले को उच्च अदालत में चुनौती दे सकता है। अधिकारियों का कहना है कि वे कानूनी विकल्पों पर विचार कर रहे हैं और आगे की कार्रवाई जल्द तय की जाएगी।
H-1B वीजा अमेरिका में कुशल विदेशी पेशेवरों को काम करने की अनुमति देने वाला प्रमुख कार्यक्रम माना जाता है। हर वर्ष बड़ी संख्या में तकनीकी, इंजीनियरिंग, स्वास्थ्य और अन्य विशेषज्ञ क्षेत्रों के पेशेवर इस वीजा के माध्यम से अमेरिका पहुंचते हैं। इनमें भारतीय पेशेवरों की हिस्सेदारी सबसे अधिक मानी जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत के इस फैसले से उन कंपनियों और आवेदकों को राहत मिलेगी जो बढ़ी हुई लागत को लेकर चिंतित थे। साथ ही, इससे भविष्य में वीजा नीति और आव्रजन नियमों पर होने वाली बहस को भी नई दिशा मिल सकती है।
फिलहाल इस मामले पर अंतिम निर्णय कानूनी प्रक्रिया के अगले चरणों पर निर्भर करेगा, लेकिन मौजूदा फैसले को वीजा आवेदकों और उद्योग जगत के लिए महत्वपूर्ण राहत के रूप में देखा जा रहा है।
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