मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और संभावित युद्ध जैसी स्थिति ने वैश्विक तेल बाजार को झकझोर दिया है। खासकर होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से तेल और गैस की सप्लाई पर बड़ा असर पड़ा है। यह मार्ग दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा ट्रांजिट रूट्स में से एक है, जहां से भारी मात्रा में कच्चा तेल और गैस की आपूर्ति होती है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, रोजाना 12–13 मिलियन बैरल तक तेल सप्लाई प्रभावित हो रही है, जो वैश्विक मांग का लगभग 11–13% हिस्सा है। अनुमान है कि कुछ ही हफ्तों में सैकड़ों मिलियन बैरल तेल बाजार से गायब हो चुका है, जिससे यह अब तक के सबसे बड़े सप्लाई शॉक्स में गिना जा रहा है।
इतिहास से बड़ा संकट?
तुलना करें तो 1973 ऑयल क्राइसिस, 1979 ईरानी क्रांति और 1991 खाड़ी युद्ध के दौरान भी तेल सप्लाई प्रभावित हुई थी, लेकिन मौजूदा संकट का असर उससे कहीं ज्यादा व्यापक माना जा रहा है।
गैस और फ्यूल पर भी असर
यह संकट सिर्फ कच्चे तेल तक सीमित नहीं है। कतर जैसे देशों से आने वाली LNG सप्लाई प्रभावित हुई है। साथ ही डीजल, जेट फ्यूल और उर्वरकों की उपलब्धता भी कम हो रही है, जिससे ट्रांसपोर्ट और एविएशन सेक्टर पर दबाव बढ़ गया है।
कीमतों में तेज उछाल
तेल की कीमतें तेजी से बढ़कर करीब 95 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जो पहले लगभग 70 डॉलर के आसपास थीं। सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे बड़े निर्यातक देश भी होर्मुज मार्ग बाधित होने से पूरी क्षमता से निर्यात नहीं कर पा रहे हैं।
तेजी से घटती सप्लाई
विशेषज्ञों के अनुसार, वैश्विक स्तर पर तेल की सप्लाई तेजी से घट रही है और स्टॉक भी खत्म होने की कगार पर हैं। अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो यह संकट कोविड-19 के दौरान आई गिरावट के बाद सबसे बड़ी सप्लाई कमी साबित हो सकता है।
आगे क्या?
मिडिल ईस्ट दुनिया की करीब 30% तेल आपूर्ति करता है। ऐसे में अगर स्थिति और बिगड़ती है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है। भले ही तनाव जल्द खत्म हो जाए, लेकिन सप्लाई को सामान्य होने में महीनों या साल लग सकते हैं।
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